न्यायिक सक्रियता बनाम शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत

 

अलेख कुमार साहू1, .. खान2

1वरिष्ठ सहायक प्राध्यापक, विधि अध्ययन शाला, पं. रविशंकर वि.वि. रायपुर

2प्राध्यापक, विधि अध्ययन शाला,       पं. रविशंकर वि.वि. रायपुर

*Corresponding Author E-mail: alekh.ku.sahu@gmail.com

 

ABSTRACT

संसदीय प्रजातंत्र की स्थापना के साथ हमारे देश और समाज में राज्य व्यवस्था को पृथक परन्तु पूरक स्तंभों में बांटा। हमारा लोकतंत्र सिद्धांततः ऊपर से नीचे तक सत्ता के विकेन्द्रीकरण का पक्षधर तो था, लेकिन व्यवहारतः यह पक्षधरता सत्ता के केन्द्रीकरण को बनाये रखने का मात्र एक नारा बनकर रह जाती थी। इस केन्द्रीय विकेन्द्रीकरण के चलते हमारे लोकतंत्र का जो भी रूप-स्वरूप बना, उसके तीन खम्भे घोषित किये गये। न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका - इन तीनों खम्भों को संवैधानिक मान्यता दी गई। भारतीय प्रेस को चैथा खम्भा माना गया, परन्तु यह मान्यता अघोषित थी और इसका संविधान में कहीं उल्लेख नहीं था।

 

KEYWORDS न्यायिक सक्रियता, शक्ति पृथक्करण, न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका

 

 

 

शोध उद्देश्य-

1. शक्ति पृथक्करण की व्याख्या।

2. न्यायिक सक्रियतावाद की व्याख्या।

3. उपर्युक्त दोनों उद्देश्यों की संतुलित व्याख्या।

 

प्रस्तावनाः-

लोकतांत्रिक सरकार के लिए शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत एक आधारभूत अपेक्षा है, शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत काफी प्राचीन है, दार्शनिक अरस्तु को उसका प्रवर्तक माना जाता है, इनके समय में शासन की शक्तियां सार्वजनिक सभा, दंडाधीश व न्यायपालिका के रूप में विभाजित थी। एथेंस शासनकाल में यद्यपि शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत पूर्णतः लागू नहीं था परन्तु शक्तियों को एक-दूसरें के संतुलन में रखा गया था। रोम शासनकाल में शक्तियां सीनेट, काउन्सिल तथा ट्रिब्यूनेस के रूप में विभाजित परन्तु सीनेट को सर्वोच्च शक्ति प्राप्त थी एवं अन्य दोनों उसके अधीन थे। परन्तु इसका शास्त्रीय विवेचना मान्टेस्क्यू ने ब्रिटिश संविधान गतिशीलता को देखकर किया था।2

 

मान्टेस्क्यू ऐसे किसी भी शासन के विरूद्ध थे, जो निरंकुश हो तथा व्यक्ति की स्वतंत्रता को नष्ट कर दे। वे मानव स्वतंत्रता का महान प्रति पालक और समर्थन थे, उसका मत था कि यदि सरकार को जितने शक्तियां, व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका एक ही व्यक्ति अथवा शासन के किसी एक ही निकाय में समाहित हो जाये। तो नागरिक स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है।3

 

मानव ने समाज और उसकी संस्थाओं के बारे में जब से चिन्तन प्रारंभ किया, तब से न्याय की अवधारणा दार्शनिकों के चिन्तन का विषय रहा है। पाश्चात्य और पौर्वात्य देशों के दर्शन में न्याय की अवधारणा का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। न्याय को विभिन्न व्यक्तियों एवं व्यक्ति समूहों के विभिन्न स्थानों, समयों, रूपों एवं मानदंडों के अनुसार व्याख्यापित किया। प्रत्येक मनुष्य के लिए इसके निहितार्थ भिन्न-भिन्न है। न्याय का विचार गत्यात्मक विषय है। अतः इसके निहितार्थ में परिवर्तन आता रहा है।4

विधि समस्त शासन पर आधारित प्रत्येक शासन प्रणाली चाहे उसका कोई भी रूप हो, अपने नागरिकों को आश्वासन देता है कि प्रत्येक को न्याय मिलेगा।

शक्तियाँ बनाम न्यायपालिका-

भारत के संविधान के अनुच्छेद 143 के अधीन मामलें में संसद के विशेषाधिकारों के विषय में उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए निर्देशन पर विचार करते हुये शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का एक और पहलू बताया है।

 

’’इस विषय का एक और भी पहले है, जिसे कहना आवश्यक है: चाहे भारतीय संविधान की शक्तियों का स्पष्ट कड़ा पृथक्करण हो या न हो, इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस देश के संविधान के उपबंधों का अर्थान्वयन करने तथा नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा करने का कार्य संविधान ने न्यायालयों के हवाले किया है। इस दृष्टि से यद्यपि कि संविधान शक्तियों के कठोर पृथक्करण को स्वीकार नहीं करता, फिर भी यह स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए उपबंध करता है, जिसको विधायिका और कार्यपालिका के कार्यो पर विस्तृृत अधिकारिता प्राप्त है।

 

भारत में 1970 के दशक में न्यायिक सृजनशीलता का विशिष्ट रूप से प्रारंभ हुआ जो सक्रियतावाद के रूप में विकसित हुआ है। केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य5 में निर्णय दिया कि संसद शक्ति का प्रयोग कर संविधान के मूल ढांचे को विनष्ट नहीं कर सकती है। डाॅ. बख्शी ने इसे संविधान के कुछ अनुच्छेदों पर मात्र प्रतिवेदित मामला न मानकर ’’भविष्य का भारतीय संविधान’’ कहा है। केशवानन्द भारती के मामले में प्रदर्शित न्यायिक सृजनशीलता पूर्व की अनुदारवादी सक्रियतावाद और नवीन उदारवादी न्यायिक सक्रियतावाद की चैखट हैै।6

 

न्यायिक सक्रियतावाद की परिभाषा करते हुए ब्लैकस लाॅ डिक्शनरी में स्पष्ट किया गया है कि न्यायिक सक्रियतावाद एक न्यायिक दर्शन (श्रनकपबपंस च्ीपसवेवचील) है जो न्यायाधीशों को प्रगतिशील एवं नवीन नीतियों, जो अपीलीय न्यायाधीशों से अपेक्षित मर्यादा से हमेशा संगत नहीं है, के पक्ष में न्यायिक पूर्व निर्णय के कठोर अनुपालन से विचलित होने को अभिप्रेरित करती है। सामान्यतः यह सामाजिक अभिनियंत्रण की अपेक्षा वाले निर्णयों में स्पष्ट होती है और यदा-कदा ये निर्णय विधायी एवं कार्यपालिका विषयों में घुसपैठ या बलात्-प्रवेश (पदेजनेपवद) का प्रतिनिधित्व करते है। लारंेस बौम (स्ंूतमदबम ठंनउ) ने इंगित किया है कि बीसवीं शताब्दी में न्यायालय ने न्यायिक सक्रियतावाद की तरफ झुकाव प्रदर्शित किया है जिसके द्वारा न्यायालय ने अन्य सरकारी शाखाओं (विधायिका और कार्यपालिका) के निर्णयों को अभिखण्डित (ैजतपाम कवूद) अथवा सारतः (ैनइेजंदजपंससल) उपान्तरित या परिवर्तित (डवकपलि) किया है।7

 

उच्चतम न्यायालय के सक्रियतावाद के कारण जेल सुधार में क्रांतिकारी परिवर्तन सम्भव हो चुका है। उच्चतम न्यायालय ने आपराधिक विधियों का निर्वचन अनु. 21 के सन्दर्भ में करते हुए अत्यन्त सक्रियता का परिचय दिया है और इस प्रकार एकान्त परिरोध या काल कोठरी (ैवसपजंतल ब्वदपिदमउमदज) के विरूद्ध अधिकार, हथकड़ी और बेड़ी के विरूद्ध अधिकार, विधिक सहायता का अधिकार, मृत्युदण्ड के निष्पादन के विलम्ब की दशा में आजीवन कारावास, पुलिस अभिरक्षा में की गयी हिंसा के विरूद्ध अधिकार, आदि अधिकारों, को मूल अधिकारों में सम्मिलित किया है।8

 

भारतीय उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक सक्रियता के माध्यम से विश्व न्यायिक विधिशास्त्र को एक अनूठी (ेनपहमदमतपे) संकल्पना निदान मूलक याचिका के रूप में दी है परन्तु न्यायिक विधिमान्यता को ध्यान में रखकर सम्यक रूप से मान्यता यही है कि ’’न्यायालय विधि घोषित कर सकते है। वे विधि का निर्वचन कर सकते हैं वे स्पष्ट कमी (संबनदंस) को दूर कर सकते है और अन्तराल को भर सकते हैं, परन्तु वे उचित रूप में विधायिका हेतु अपेक्षित विधायन के क्षेत्र में घुसपैठ नहीं कर सकते हैं, ’’भारत के पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति डाॅ..एस. आनन्द के शब्दों में ’’सक्रियता औचित्यपूर्ण है परन्तु अति उत्साह नहीं (ंबजपअपेउ पे रनेजपपिमक इनज दवज ंकअमदजनतपेउ).

 

रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा के वाद में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने न्याय प्रशासन सम्बन्धी विधिशास्त्र में एक अनूठी एवं एकदम नवीन संकल्पना को जोड़ा है। यह है निदानमूलक या रक्षक याचिका की संकल्पना। यह संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों का नवीन अर्थान्वयन करती है। इस मामले में त्रिसदस्यीय पीठ ने इस बिन्दु पर संविधान पीठ द्वारा निर्णय कर अपेक्षा की थी कि क्या उच्चतम न्यायालय के किसी निर्णय की पुनर्विचार याचिका खारिज किए जाने के पश्चात् वैधानिकता के प्रश्न सम्बन्धी रिट याचिका अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत पोषणीय है ? संविधान पीठ का प्रमुख बहुमत का निर्णय न्या. सईद शाह मोहम्मद कादरी ने कहा कि पुनर्विचार याचिका के खारिज हो जाने के बाद न्यायिक प्रक्रिया के दुरूपयोग को निवारने तथा न्याय की गम्भीर विफलता के उपचार हेतु निदान मूलक याचिका (बनतंजपअम चमजपजपवद) के माध्यम से उच्चतम न्यायालय की अन्तर्निहित शक्तियों (पदीमतमदज चवूमते) के अन्तर्गत पुनरावलोकन/परीक्षण (त्मबवदेपकमतंजपवद) सम्भव है यह भी स्पष्ट किया गया कि उच्चतम न्यायालय के केवल पुनर्विचार क्षेत्राधिकार के माध्यम से ही शिकायत दूर करने का रास्ता या उपाय (ंअमदनम) नहीं है जो कि संविधान द्वारा प्रदत्त है बल्कि इस देश में सभी तरह की शिकायतों को दूर करने का विचार स्थल (वितनउ) और मंच (च्संजमवितउ) है।9

 

निष्कर्ष-

भारतीय संविधान शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को अंशतः स्वीकार करता है। संविधान की सर्वोपरीता में शक्तियों को एक-दूसरें में संतुलित की गई है। कार्यपालिका, विधायिका की शक्तियाँ न्यायालय द्वारा निर्वचनीय योग्य है तथा न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति न्यायालय को संविधान में निहित कर दी गई है।

 

निःसन्देह इस कहावत में काफी सच्चाई है कि ’’अन्तिमता एक अच्छी वस्तु है परन्तु न्याय बेहतर है’’ (लार्ड ऐटकिन)। परन्तु अन्तिमता भी न्याय का एक पहलू है। निदान मूलक याचिका न्यायिक सक्रियता बनाम शक्ति पृथक्करण का एक अच्छा उदाहरण है।

 

संदर्भ एवं पाद टिप्पणी-

(1) हमारा लोकतंत्र व जानने का अधिकार, अरूण पाण्डेय, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली 2005 संस्करण, पेज नं. 8, 9

(2) जय जय राम उपाध्याय, प्रशासनिक विधि, सेन्ट्रल लाॅ एजेन्सी, सातवां संस्करण पेज नं.  32.

(3) त्रत्रैव

(4) न्याय के नूतन आयाम, डाॅ. प्रभा भार्गव, रेशम भार्गव, राजस्थान हिन्दी गं्रथ अकादमी, जयपुर प्रथम संस्करण.

(5) (1973) उम.नि.. 159.

(6) संविधानिक निर्वचन के सिद्धान्त, डाॅ. अनिरूद्ध प्रसाद, सेन्ट्रल लाॅ पब्लिकेशन इलाहाबाद, तृतीय संस्करण, पेज नं. 43.

(7) त्रत्रैव

(8) त्रत्रैव

(9) (2002) 4, सु.को.के. 388.

 

 

 

Received on 23.03.2016       Modified on 17.05.2016

Accepted on 06.06.2016      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences 4(2): April- June, 2016; Page 119-121